नदी की कसम है सदी भर तुम्हारा यहीं पर खड़ी नाम जपती रहूँगी,
मिलें दर्द चाहे हज़ारों मगर मैं शिकायत किए बिन अकेले सहूँगी,
कठिन यह तपस्या हुई सिद्ध जिस दिन नदी की तरह जोश लेकर बहूँगी,
मुझे जलपरी प्यार से तुम बुलाना, तुम्हें प्राण प्रिय प्राण वल्लभ कहूँगी।।
कमल के सरोवर भ्रमर से भरे हैं, धरा भी हरा हार धारण किए है,
बनी रातरानी जवानी सुहानी नशीले कई घूँट जमकर पिए है।
नहाती हुई अप्सरा होंठ अपने विचारों में खोकर स्वयं ही सिए है,
नहीं रूप का यदि प्रशंसक वहाँ है कली की जवानी भला किस लिए है?
पवन का प्रसारण इधर हो रहा है, उधर भास्कर का उदय हो रहा है,
बदन में मदन काम के बीज रति को लिए साथ में हर घड़ी बो रहा है।
नियंत्रण न तन पर न ही ज़ोर मन पर प्रबल चेतना का चलन खो रहा है,
तड़पती हुई तितलियाँ कह रही हैं कमल के उदर में भ्रमर सो रहा है।।
कमल नाल जैसी कमर कसमसाकर उतरती गई पारदर्शी वलय में,
हरे नीर में जो मज़ा मिल रहा है नहीं मिल सका वह कभी भी निलय में।
जहाँ जाह्नवी सिंधु तक आ गई है शिकायत नहीं है वहाँ फिर विलय में,
नई सर्जना का छिपा बीज होगा नज़र आ रहे हर उफनते प्रलय में।।
इधर केश काले कमल चूमते तो उधर बरगदों की लटें नीर चूमें,
दिवाकर उजागर किए रश्मियों को गुलाबी गुलाबी गरम चीर चूमे।
लिखे जिस तरह जाफरानी ग़ज़ल तो प्रफुल्लित हृदय से कलम मीर चूमे,
उसी भाँति गोरी उतरकर सरोवर सुहानी सलिल शुद्ध तक़दीर चूमे।।
न तन निर्वसन है न मन निर्वसन है धरा तो ढकी पर गगन निर्वसन है,
धवल रश्मियों के नवल संचरण से हरे रंग वाला ये वन निर्वसन है।
कली की गली में ढली रात जब से तभी से भ्रमर का चलन निर्वसन है,
गुलाबी गठीले बदन को उठाकर सरोवर कहे आचमन निर्वसन है।।
बदन पर वसन जब चिपककर चलेंगे नज़र तब उठाना कठिन काम होगा,
उड़ेंगी यहाँ धज्जियाँ धीर की तो युवा हर हृदय बीच संग्राम होगा।
बचेगा विवेकी यहाँ नर न कोई सभी का स्वयं चित्त नीलाम होगा,
किसी को पता यह हक़ीकत नहीं है मुक़द्दर में किसके ये ईनाम होगा?
सरोवर हरा है हरे वन सुहावन घटा पावसी मन लुभावन लगी है,
सुरभि यह सजीली निहारें नयन तो मिलन की प्रबल आस मन में जगी है।
जहाँ मतलबी है ज़माना वहीं पर प्रकृति की सुमति आज सबसे सगी है,
चले आओ साजन, प्रणय का समय है, उभरती हृदय मध्य दीवानगी है।।
न बंगला, न जेवर, हवेली, खज़ाना न ही कोई महँगा भवन माँगती हूँ,
मुझे प्राण प्रिय की दिलाए जो यादें महकती हुई वह पवन माँगती हूँ
जहाँ कोयलों के मधुर सुर उभरते वही मैं सुहाना चमन माँगती हूँ,
सजन की लगन में मगन बावली मैं उन्हीं का पुनः आगमन माँगती हूँ।
चकाचौंध शहरी, न तपती दुपहरी, न काया छरहरी सजन माँगती हूँ।
विविध रंग रोगन, दिखावा हटाकर प्रकृति प्रेम का पुंसवन माँगती हूँ।
न ऊँची अटारी, न सुविधाएं सारी, न कोई सुनहरे सपन माँगती हूँ,
मगर इस धरा पर सरोवर सजीले लता, पुष्प, पौधे सघन माँगती हूँ।
तरंगित सरोवर, धुला नील अम्बर, महकते हुए कुछ सुमन माँगती हूँ,
परस्पर पनपता जहाँ प्रेम प्रति पल वही मुस्कुराता भुवन माँगती हूँ
सुहानी, सजीली, सुकृत, शिष्ट धरती कली की सुकोमल छुवन माँगती हूँ।
सजन से समागम सफल, सिद्ध हो जब चहकता हुआ तब सुवन माँगती हूँ।
अभी तो नहाया सरोवर उतरकर अभी रूप अपना सँवारा नहीं है,
लिए हाथ में एक दर्पण, सजीला स्वयं को अभी तक निहारा नहीं है।
भले हूँ अकेली मगर प्यार मेरा जगत में कहीं बेसहारा नहीं है,
गनीमत यही है करुण भाव भरकर अभी प्राण प्रिय को पुकारा नहीं है।।
मुझे जिस तरह याद उनकी सताती उन्हें भी इसी भाँति एहसास होगा,
उन्होंने यक़ीनन बदन का अभी तक सलामत रखा एक उपवास होगा।
मिलेंगे सजन शीघ्र आकर यहीं पर बहुत देर तक हास परिहास होगा,
ढलेगा दिवाकर धुँधलका बढ़ेगा कसम कृष्ण की फिर महारास होगा।।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X