-----कृष्ण सुदामा पद्म वृत्तान्त-----
अरे! ओ दरिद्र तेरी, मति क्यों है मारी,
अन्दर नहीं जा सकते, मैं हूँ यहाँ प्रहरी!
बस्ती में जाकर कोई, द्वार खटखटाओ,
महल है कृष्ण का ये, द्वारिका है नगरी!
प्रणाम पहरेदार! मैं तो कृष्ण का हूँ यार,
मिलना है कन्हैया से, खोल दो ये द्वार!
साथ हम थे खेले, हम, साथ ही पढे हैं,
घनिष्ठ है सखा मेरा, विशिष्ट मेरा प्यार!
सुन कर ये प्रहरी, बहुत खिलखिलाया,
ठिठोली ठिठोली में, पीछे धकियाया !
बोला मूर्ख मानव, वस्त्रहीन ब्राह्मण,
जर्जर शरीर तेरा, दिमाग सठिआया!
रूद्र करूणा से, सुदामा गिडगिडाया,
द्वारपाल को तनिक, तरस नहीं आया!
सुदामा ने झुकके, जब अनुरोध कीन्हा,
आँखों से पानी बाहर, अनायास आया!
गोकुल से आया हूँ मिलने मैं कह दो,
बचपन का यार तेरा, संदेश यह दो!
विश्वास है मुझको वो, पहचान लेगा,
सुदामा है नाम मेरा, परिचय ये दे दो!
हठ से सुदामा की, द्वारपाल हारा,
छाँव में बैठाकर, दे दिया सहारा!
प्रतीक्षा करो मैं, तुरन्त वापस आया,
पूँछता हूँ जाके अजब दोस्त है न्यारा!
जाके द्वारपाल ने जब, कृष्ण को बताया,
लंगोटी में वस्त्रहीन, मिलने कोई आया!
बचपन का यार कहता, नाम है सुदामा,
लम्बी है शिखा सिर पर, नंगे पाँव आया!
हतप्रभ कान्हा सरपट, दौडे चले आए,
देख सुदामा को, बरबस ही मुस्कुराए!
बाँहों में भर कर अपने, गले से लगाया,
सुदामा की आँखों में, आँसू भर आए!
महलों में जाके, बीती यादों में खोए,
हाथों से स्वयं, पैर अँश्रुओं से धोए!
पोटली बगल में, छुपाए कुछ सुदामा,
संकोचवश थे बैठे, सुध बुध खोए!
कान्हा समझ गये, कि संकोच क्या है?
पूँछ बैठे बोले खोलो, पोटली में क्या है!
झिझकते झिझकते, सुदामा ने बताया,
भाभी ने थोडा सा, ये चावल दिया है!
सुन कर कन्हैया, मन ही मन हर्षाऐ,
खोल पोटली चावल , मुट्ठी भर खाए!
रुक्मणी ने आ कर, तब हाथ रोका,
तीन लोक दे दिए क्या और मन भाए!
ऐसे हैं दयालु, कृष्ण मेरे भगवन,
करते हैं कृपा जो, करते हैं वन्दन!
हमें भी प्रभु जी, शरण में बुला लो,
नाथ मेरे नारायण, देवकी के नन्दन!
आर के चौहान
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