आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

वो अनजान है...

                
                                                         
                            वो अनजान है मेरी इस बेचैनी से,
                                                                 
                            
वो बेखबर है मेरी हर रात से....
मैं हर दुआ में उसी को मांग लेता हूँ,
और फिर दुआ के बाद खुद ही डर जाता हूँ!
कि अगर उसे पता चला तो क्या! सोचेगी,
क्या इस पागल दिल का हाल समझेगी ?
इसलिए रहने दो, ये राज़ राज़ ही रहने दो,
मुझे उसकी यादों में ही आबाद रहने दो।
-अर्णव
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक घंटा पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर