हर शख़्स आईने की तरह नहीं होता।
हर चेहरा सच्चा-ए-बयां नहीं होता।
कुछ लोग मिलते हैं मतलब के लिए।
हर ताल्लुक़ दिल से बयां नहीं होता।
आईना तो वही दिखाता है जो सच है।
इंसान का हर किरदार मुफ़िक नहीं होता।
कुछ मुस्कुरा के भी दर्द छुपा लेते हैं।
हर अश्क आँखों से रवां नहीं होता।
-अर्णव.....
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X