रोज़ मिलता हूँ उससे, मगर इज़हार नहीं होता,
दिल में है जो बात, वो इकरार नहीं होता।
वो शाम ढले आती है, नज़ाकत लिए हुए!
उसे देख के ये दिल, बहुत बेकरार होता हैं।
उसकी आँखों में है एक अर्णव-सा गहरा सुकून है
डूब जाता हूँ उसमें, पर पार नहीं होता।
मैं सोचता हूँ कह दूँ, तू मेरी आरज़ू है।
लब तक आती है बात, पर इज़हार नहीं होता।
-अर्णव....
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