विचार नहीं, व्यवहार देखिए
फ़ासला रखकर आखिर क्या हासिल कर लिया तुमने,
यह कहकर कि
“मेरे तुमसे विचार नहीं मिलते।”
विचार तो शायद
कभी पूरी तरह मिलेंगे भी नहीं,
साथ का अर्थ ही यह है
कि विचार अलग हों,
फिर भी इंसानियत का व्यवहार बना रहे।
साथ उसे नहीं कहते
जब हर बात पर सहमति हो,
साथ तो उसे कहते हैं
जब असहमति के बावजूद
सम्मान और अपनापन हो।
अच्छी चीज़ तो सबको पसंद आती है,
किसी की अच्छाई पसंद करना क्या बड़ी बात है?
कभी किसी की कमियों को समझकर,
उसकी कमज़ोरियों के बावजूद
उसका हाथ थामकर देखो—
तब कहेंगे, पसंद तुम्हारी है।
एक जैसे विचार होना
समाज की पसंद हो सकती है,
तुम्हारी अपनी समझ नहीं।
एक ही माँ की कोख से जन्मे
बच्चों के विचार तक एक जैसे नहीं होते,
फिर तुम चाहते हो
कि तीस साल की अलग-अलग परवरिश पाए
दो इंसानों के विचार
हर बात पर एक जैसे हों?
रिश्ते विचारों के मेल से नहीं,
इंसानियत के व्यवहार से टिकते हैं।
जहाँ विचार अलग होकर भी
दिल साथ रह जाएँ,
वही असली साथ कहलाता है।
-रजनी
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