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उसकी खामोशी को शांति मत समझना

                
                                                         
                            उसकी खामोशी को शांति मत समझना
                                                                 
                            

औरत जब माँगते-माँगते थक जाती है,
मिन्नतें करते-करते थक जाती है,
तो एक दिन कमी से ज्यादा
बार-बार माँगने की बेइज़्ज़ती चुभने लगती है।

पहले वह आपको समझाती है,
फिर याद दिलाती है,
फिर शिकायत करती है,
फिर लड़ती है,
और एक दिन ऐसा आता है—
वह सब कुछ कहना ही बंद कर देती है।

तब लोगों को लगता है,
अब सब ठीक चल रहा है,
मगर सच तो यह है
कि ठीक कुछ भी नहीं चलता,
बस उसकी उम्मीद खत्म हो जाती है।

उसे आज भी
प्यार चाहिए, अपनापन चाहिए,
साथ चाहिए, सहारा चाहिए,
मगर अब वह अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए
हाथ फैलाना नहीं चाहती।

क्योंकि वह सीख चुकी होती है—
बोलने से कुछ नहीं बदलेगा,
रोने से कुछ नहीं बदलेगा,
लड़ने से कुछ नहीं बदलेगा,
बार-बार माँगने से भी
कुछ नहीं बदलेगा।

जिस औरत को
बार-बार माँगने पर मजबूर करके
तुमने भिखारी बना दिया,
उसकी खामोशी को शांति मत समझना।

वह खुश नहीं है,
वह बस थक चुकी है।

अब उसे शिकायत भी नहीं,
उम्मीद भी नहीं—
बस माँगने की हिम्मत खत्म हो गई है।
-रजनी
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक घंटा पहले

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