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सिसकियाँ बेहिसाब हैं।

                
                                                         
                            ये जो थम गई है
                                                                 
                            
बात करने की आदत,
यक़ीन मानो,
इसके पीछे
सिसकियाँ बेहिसाब हैं।

अब हर सवाल से
जी चुराने लगे हैं हम,
हर जवाब को
सीने में दबाने लगे हैं हम।

कभी शब्दों में
दर्द बह जाता था,
अब ख़ामोशी में
सब कुछ कह जाता है।

जो समझना था,
वो समझे नहीं,
जो कहना था,
वो कहे नहीं।

इसलिए अब
चुप रहना सीख लिया है,
अपने ही आँसुओं को
अपना हमराज़ बना लिया है।

ये जो थम गई है
बात करने की आदत,
इसे बेरुख़ी मत समझना,
यक़ीन मानो,
इसके पीछे
सिसकियाँ बेहिसाब हैं।

— रजनी
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एक घंटा पहले

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