प्रेम के बाद जो मरता है
प्रेम के बिना कोई नहीं मरता,
लोग वैसे ही सुबह उठते हैं,
अपने काम पर जाते हैं,
हँसते भी हैं, रोते भी हैं,
भूख लगने पर खाना भी खाते हैं।
दुनिया की नज़र में
ज़िंदगी चलती रहती है,
दिन अपनी रफ़्तार से ढलते हैं,
चेहरे पहले जैसे ही दिखते हैं,
बस भीतर कुछ बदल जाता है।
मरता है तो वो हिस्सा,
जो कभी बहुत कोमल था,
जो किसी के होने भर से
इस पूरी दुनिया को
सुंदर मान बैठा था।
मरता है वो भरोसा,
जो बिना शर्त किसी को
अपना समझ बैठा था,
वो मासूमियत,
जो प्रेम को ही
जीने की सबसे बड़ी वजह मान बैठी थी।
फिर इंसान जीता तो है,
मगर पहले जैसा नहीं रहता,
हँसता है, मगर हँसी में
वो मासूम चमक नहीं होती।
क्योंकि प्रेम के बाद
इंसान नहीं मरता,
बस उसके भीतर का
वो नाज़ुक इंसान
चुपचाप मर जाता है,
जो किसी के होने से
पूरी दुनिया को खूबसूरत
मान बैठा था।
— रजनी
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