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जो उसकी योजना में लिखा होता है।

                
                                                         
                            प्रकृति की योजना
                                                                 
                            

योजनाएँ तो मैंने बहुत बनाईं,
अपने सुख को सुरक्षित करने के लिए,
आधा जीवन निकल गया
बस योजनाएँ बनाते-बनाते।

सोचा था यूँ दुख दूर कर लूँगी,
सोचा था सब कुछ अपने अनुसार कर लूँगी,
मगर प्रकृति की योजना के आगे
मेरी हर योजना धरी की धरी रह गई।

एक-एक करके सब योजनाएँ विफल हुईं,
कोई भी दुख को दूर न कर पाई,
और शायद न कर पाएगी,
क्योंकि होना तो वही है
जो प्रकृति ने तय किया है।

इंसान बस योजनाएँ बनाता है,
प्रकृति अपना निर्णय सुनाती है,
और अंत में वही होता है
जो उसकी योजना में लिखा होता है।
— रजनी
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एक घंटा पहले

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