मेहनत की कमाई
किराए का घर हो,
बच्चों की परवरिश हो,
और अकेले अपने दम पर
घर चलाना हो—
ये हँसी-मज़ाक का खेल नहीं,
बहुत बड़ा संघर्ष है।
नौकरी निजी हो,
फिर भी हर जिम्मेदारी निभानी हो,
कभी इधर भागना,
कभी उधर दौड़ना,
अपनों के लिए हर पल
खुद को खपाना हो—
यही तो असली इंसान की पहचान है।
जिसे विरासत के नाम पर
कुछ नहीं, बस कर्ज़ मिला हो,
जिसे अपने हिस्से की जिंदगी भी
लोन की किस्तों में चुकानी पड़ी हो,
वही जानता है
एक-एक रुपया कमाने का दर्द।
जिसे बिना मेहनत के
सब कुछ मिल गया,
वह क्या जाने
पसीने की कीमत क्या होती है।
जो दूसरों की मेहनत को
लूटकर अपना घर भरते हैं,
उन्हें कहाँ एहसास होता है
कि कमाई सिर्फ पैसा नहीं होती—
उसमें किसी की नींद,
किसी की थकान,
किसी के अधूरे सपने
और पूरी जिंदगी लगी होती है।
मेहनत से कमाया हुआ थोड़ा भी
इंसान को भीतर से अमीर करता है,
क्योंकि उसे पता होता है—
ये किसी की लूट नहीं,
मेरे संघर्ष की कमाई है।
— रजनी
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