खुद को रिहा लिखूँगी
भीड़ को भ्रम लिखूँगी,
एकांत को सत्य लिखूँगी,
दोस्ती को फ़रेब लिखूँगी,
प्रेम की हर छलना को
एक नया नाम लिखूँगी।
रिश्तों को साज़िश लिखूँगी,
अपनों को मतलब लिखूँगी,
हर मुस्कान के पीछे छिपे
स्वार्थ को बेनक़ाब लिखूँगी।
बहुत लिख लिया मैंने
लोगों के दिए हुए किस्से,
अब अपनी कहानी लिखूँगी,
जो सच होगा वही लिखूँगी।
फिर तोड़ दूँगी अपनी कलम,
हर शब्द से रिश्ता तोड़ दूँगी,
और आख़िर में
किसी किताब में नहीं—
अपने भीतर
खुद को रिहा लिखूँगी।
-रजनी
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