ख़ुद को चुनना सीखो
अगर औरत को मर्द की ज़िंदगी से
कुछ सीखना है,
तो सबसे पहले उसे
स्वार्थी होना सीखना है।
क्योंकि मर्द से बड़ा स्वार्थी
कोई नहीं होता,
वो अपनी ख़ुशी के लिए जीता है,
और औरत परिवार की ख़ुशी में
अपनी ख़ुशी ढूँढ़ती है।
मर्द को अगर चुनाव दिया जाए,
कि ख़ुद को चुने या परिवार को,
तो अक्सर वो ख़ुद को चुनेगा,
अपने सपनों, अपनी इच्छाओं को चुनेगा,
अपने सुख को सबसे ऊपर रखेगा।
लेकिन औरत को जब यही चुनाव मिले,
तो वो ख़ुद को पीछे छोड़ देगी,
अपने सपनों की बलि देकर भी
अपने परिवार को चुन लेगी।
पति की ख़ुशी के लिए झुकेगी,
बच्चों के लिए हर दर्द सहेगी,
रिश्तों को बचाने की ख़ातिर
अपनी इच्छाओं को दफ़न करेगी।
सबकी ज़रूरतों का ख़याल रखते-रखते
वो ख़ुद को भूल जाती है,
सबकी ज़िंदगी सँवारते-सँवारते
अपनी ज़िंदगी पीछे छोड़ जाती है।
आख़िर क्यों हर बार
त्याग की उम्मीद उसी से हो?
क्यों हर रिश्ते की क़ीमत पर
औरत की ख़ुशी ही कम हो?
परिवार से प्रेम करना अच्छी बात है,
रिश्तों के लिए जीना भी ख़ास बात है,
मगर अपने अस्तित्व को मिटा देना
कोई महानता नहीं, न इंसाफ़ की बात है।
इसलिए ऐ औरत!
अगर मर्द की ज़िंदगी से कुछ सीखना है,
तो अपनी ख़ुशी को महत्व देना सीख,
हर बार दूसरों को चुनने के बजाय
कभी ख़ुद को चुनना सीख।
क्योंकि तुम्हारे सपने भी अपने हैं,
तुम्हारी इच्छाएँ भी अनमोल हैं,
तुम केवल किसी की पत्नी या माँ नहीं,
तुम्हारी अपनी पहचान भी अनमोल है।
अब हर बार परिवार ही नहीं,
कभी अपने लिए भी खड़ी होना सीख,
सबको चुनते-चुनते उम्र गुज़ार दी,
अब एक बार ख़ुद को चुनना सीख।
— रजनी
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