कानून की रखवाली
कानून बनाया गया था
नारी को बचाने के लिए,
कमज़ोर का सहारा बनने के लिए,
मगर न जाने कितनी औरतें
आज भी सहारा ढूँढ रही हैं।
कितनी ही महिलाएँ ऐसी हैं
जो खुद कानून पढ़ती हैं,
कानून की धाराएँ समझती हैं,
दूसरों को न्याय का रास्ता दिखाती हैं,
मगर अपने ही घर में
हर दिन चप्पल खाती हैं।
कल अनपढ़ थीं,
तब भी पिटती थीं,
आज वकील बन गईं,
कानून की रखवाली करती हैं,
फिर भी अपने ही घर में
खामोश खड़ी रहती हैं।
क्योंकि उन्हें डर है—
बच्चों का भविष्य न बिगड़ जाए,
मेरा नाम बदनाम न हो जाए,
मायके वालों की इज़्ज़त न मिट जाए,
और रिश्ते के टूटने का दोष
फिर से उसी औरत के सिर न आ जाए।
रिश्ता जब टूटता है
तो सवाल अक्सर औरत से होते हैं—
“तुमने निभाया क्यों नहीं?”
“तुमने सहा क्यों नहीं?”
मगर कोई यह नहीं पूछता
कि उसे तोड़ा किसने था?
यही वह कड़वी सच्चाई है
जिसे समाज सुनना नहीं चाहता—
कानून हाथ में होने के बाद भी
कई औरतें न्याय नहीं माँग पातीं,
क्योंकि अपने बच्चों, परिवार
और समाज की जिम्मेदारी
उन्होंने अपने सिर ले रखी है।
कानून किताबों में ताकत देता है,
मगर औरत को अपने जीवन में
उस ताकत का इस्तेमाल करने का साहस
समाज कब देगा?
क्योंकि सवाल सिर्फ कानून का नहीं,
उस सोच का भी है—
जहाँ औरत को बचपन से सिखाया जाता है
कि घर बचाना तुम्हारी जिम्मेदारी है,
चाहे इसके लिए
तुम्हें खुद ही क्यों न टूटना पड़े।
कड़वी बात है,
मगर सच यही है—
अनपढ़ थी तब भी पिटी,
वकील बनी तब भी पिट रही है;
फर्क सिर्फ इतना है
कि आज उसके हाथ में कानून है,
फिर भी अपने लिए
उसकी आवाज़ कहीं भीतर दब रही है।
-रजनी
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