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ज़िंदगी को जूते की नोक पर रखिए

                
                                                         
                            ज़िंदगी को जूते की नोक पर रखिए
                                                                 
                            

ज़िंदगी को जूते की नोक पर रखना सीखिए,
हर बात को दिल पर लेना छोड़िए।
क्या होगा?
मौत ही तो आ सकती है,
इससे ज़्यादा और क्या होगा?

आपके बिना दुनिया
कभी रुकी थी क्या,
और आपके बाद भी
कभी रुकेगी क्या?

फिर क्यों हर चिंता को
अपनी साँसों पर लादे फिरते हैं,
क्यों छोटी-छोटी बातों में
खुद को भीतर से तोड़ते हैं?

जीवन को जितना हल्का रखिए,
उतना ही बेहतर है,
क्योंकि यह जीवन
सिर्फ गंभीरता से जीने की चीज़ नहीं है।

यह बात समझने में
आधी से ज़्यादा उम्र निकल गई,
शरीर को थका देने के बाद,
बीमारियाँ पाल लेने के बाद
समझ आया—

ज़िंदगी को जूते की नोक पर रखकर
थोड़ा बेफिक्र होकर जीना चाहिए,
हर पल को डरकर नहीं,
खुलकर जीना चाहिए।
-रजनी
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
43 मिनट पहले

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