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दुःख भी ख़ुदा का प्रसाद

                
                                                         
                            दुःख भी ख़ुदा का प्रसाद
                                                                 
                            

एक सच्चे इंसान को
दुःख शायद ज़्यादा होता है,
क्योंकि वह हर बात को
बहुत गहराई से महसूस करता है।

गलत इंसान को क्या फ़र्क पड़ता है,
वह तो झूठ बोलकर भी
सुकून से सो जाता है,
किसी का दिल दुखाकर भी
अपने भीतर कोई दर्द नहीं पाता है।

लेकिन सच्चा इंसान
दूसरों के शब्दों को भी
दिल में उतार लेता है,
किसी की आँखों का आँसू
अपनी आँखों से बहा लेता है।

कभी-कभी सोचती हूँ,
इतना दुःख क्यों मिला मुझे?
फिर मन कहता है—
शायद यह भी ख़ुदा की देन है।

शायद उसने मुझे
इतना संवेदनशील इसलिए बनाया,
ताकि मैं दर्द को समझ सकूँ,
किसी टूटे हुए दिल को
अपना दर्द समझकर सहला सकूँ।

अब अपने दुःख से शिकायत नहीं,
इसे भी ख़ुदा का आशीर्वाद मानती हूँ,
जो आँसू उसने मेरी आँखों को दिए हैं,
उन्हें उसका प्रसाद मानती हूँ।

क्योंकि हर किसी को
दर्द महसूस करने वाला दिल नहीं मिलता,
और हर किसी को
सच्चाई के साथ जीने का साहस नहीं मिलता।

अगर मेरे हिस्से में दुःख आया है,
तो शायद इसके पीछे भी
मेरे ख़ुदा की कोई मर्ज़ी होगी—
इसलिए अब अपने आँसुओं को भी
उसकी नेमत समझकर स्वीकार करती हूँ।
— रजनी
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एक घंटा पहले

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