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धरती का सबसे बड़ा सवाल

                
                                                         
                            धरती का सबसे बड़ा सवाल
                                                                 
                            

इतिहास के पन्ने खोलती हूँ,
तो रूह तक काँप जाती है,
छोटे-से अपराध की सज़ा में
इंसानियत कहाँ खो जाती है।

कैसे-कैसे दंड दिए गए,
कैसी-कैसी यातनाएँ सहनी पड़ीं,
और जिन्हें इतिहास महान कहता है,
उनकी तलवारों से कितनी चीखें निकलीं।

एक राजा दूसरे राज्य से लड़ता,
जीतता तो जश्न मनाता,
हारने वालों की संपत्ति के साथ
उनकी स्त्रियों को भी अपना अधिकार बताता।

कितनी अजीब है मनुष्य की फितरत,
खुद भी दुखी, दूसरों को भी दुख देता है,
जिस धरती ने उसे जीवन दिया,
उसी के सीने पर घाव करता है।

अहंकार भी इसी के भीतर है,
श्रेष्ठ होने का भ्रम भी यही पालता है,
प्रकृति की हर चीज़ को जीतने निकला,
और अंत में खुद से ही हार जाता है।

शायद धरती की सबसे बड़ी भूल यही है—
कि उसने मनुष्य को इतना अधिकार दिया,
वरना पेड़ ने किसका घर छीना?
पक्षी ने किसका आसमान छीन लिया?

जानवर भूख में शिकार करता है,
मनुष्य अक्सर अहंकार में वार करता है,
फिर भी खुद को सबसे सभ्य कहता है—
यही सवाल मुझे भीतर तक झकझोरता है।

काश इंसान समझ पाता
कि धरती उसकी जागीर नहीं,
वह भी इस प्रकृति का एक हिस्सा है,
कोई सबसे ऊँची प्रजाति नहीं।

धरती को जीतने से पहले
काश इंसान खुद को जीत ले,
दूसरों को दुख देने से पहले
अपने भीतर का अहंकार मिटा ले।
-रजनी
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2 घंटे पहले

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