बिना कीमत के शौक
बहुत महँगे शौक नहीं थे मेरे,
मैंने तो बस बिना कीमत के शौक पाले थे।
इतना ही चाहा था—
कभी मैं रूठ जाऊँ,
तो कोई मुझे गले लगा ले,
मेरे दिल की बात पूछे,
और अपने दिल की बात मुझे बता दे।
बस इतने से ही तो शौक थे मेरे,
जिनमें किसी कीमत की जरूरत नहीं थी।
न कोई महँगा तोहफ़ा चाहिए था,
न कोई बड़ी ख्वाहिश थी,
बस कोई अपना-सा होकर
मेरे मन को समझ ले—
इतना ही तो चाहा था।
मगर अजीब बात है,
जिन शौकों की कोई कीमत नहीं थी,
वो भी मुझे नसीब नहीं हुए।
और सच कहूँ,
कीमत वाले शौक पालने का
मुझे कभी शौक ही नहीं था।
मैं तो बस
थोड़ा-सा प्रेम,
थोड़ा-सा अपनापन,
और दिल से निभाया हुआ
एक रिश्ता चाहती थी।
बस इतना ही…
और शायद यही
मेरी सबसे महँगी चाहत बन गई।
— रजनी
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