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अपनों के आगे मौन, पत्नी पर प्रहार

                
                                                         
                            अपनों के आगे मौन, पत्नी पर प्रहार
                                                                 
                            

तेरी मर्दानगी पर धिक्कार

तेरी माँ दिनभर चिल्लाती थी,
तेरी बहनें भी तुझे सुनाती थीं,
कभी तेरी गलती होती थी,
कभी बिना गलती के ही
तुझे उनकी बातें सुननी पड़ती थीं।

तब तूने कितनी बार
अपनी माँ पर चप्पल उठाई थी?
कितनी बार अपनी बहनों को
चप्पल से मारने की हिम्मत दिखाई थी?

जवाब है—कभी नहीं!

तब तो तू भीगी बिल्ली बनकर,
गर्दन झुकाए रहता था,
गलती तेरी न भी होती,
फिर भी चुपचाप सहता था।

कितनी बार तूने अपनी माँ से कहा,
कि घर छोड़कर चली जा?
कितनी बार अपनी बहनों को धमकाया,
कि इस घर से निकल जा?

शायद कभी नहीं,
क्योंकि उनके सामने
तेरी आवाज़ ही नहीं निकलती थी,
उनकी मर्ज़ी के आगे
तेरी एक न चलती थी।

लेकिन अपनी पत्नी को देख,
हर वक्त घर से निकालने की धमकी देता है,
वह सही बात भी कह दे अगर,
तो उसे घर से बाहर करने की बात कहता है।

जिन पर तेरा कोई ज़ोर नहीं चला,
उनके सामने तू चुपचाप झुकता रहा,
और जिस पत्नी ने तेरा साथ निभाया,
उसी पर अपना सारा गुस्सा उतारता रहा।

तेरी माँ-बहनों ने ही
जब तुझे घर से बाहर कर दिया,
तब कहाँ गई तेरी मर्दानगी,
तूने उनका क्या बिगाड़ लिया?

जिनके आगे तू कभी
अपनी आवाज़ न उठा पाया,
उन्होंने ही जब तुझे निकाला,
तब तू कुछ भी न कर पाया।

तो फिर आज अपनी पत्नी पर
तेरा इतना ज़ोर क्यों चलता है?
उसके सही बात कहने पर भी
तेरा हाथ चप्पल तक क्यों पहुँचता है?

जिस औरत ने तुझसे जुड़कर
अपना पूरा जीवन तुझको सौंप दिया,
उसी के आत्मसम्मान को कुचलकर
तूने अपनी मर्दानगी का नाम क्यों लिया?

अपनी पत्नी पर हाथ उठाना
मर्द होने की पहचान नहीं,
जो अपनी बात मनवाने के लिए
हिंसा करे, उसमें कोई शान नहीं।

मर्द तो तू तब होता,
जब सच के साथ खड़ा होता,
माँ की गलती को गलती कहता,
बहनों के अन्याय पर भी अड़ा होता।

मर्दानगी चप्पल उठाने में नहीं,
अपने क्रोध पर लगाम लगाने में है,
कमज़ोर पर अपनी ताकत दिखाने में नहीं,
निर्दोष के सम्मान को बचाने में है।

तूने माँ के आगे सिर झुकाया,
बहनों के आगे आवाज़ न उठाई,
और पत्नी ने सच क्या कह दिया,
तूने उसी पर अपनी ताकत दिखाई!

धिक्कार है ऐसी मर्दानगी पर,
जो औरत की चुप्पी को उसकी हार समझती है,
जो पत्नी के सहने को अपनी जीत
और उसके विरोध को अपनी तौहीन समझती है।

याद रख,
तेरी पत्नी तेरी जागीर नहीं,
तेरे हर ज़ुल्म को सहना
उसकी तक़दीर नहीं।

और सुन,
जो अपनी माँ और बहनों के सामने
कभी अन्याय के विरुद्ध खड़ा न हुआ,
वह पत्नी पर हाथ उठाकर
मर्द नहीं, सिर्फ़ एक कायर हुआ।

मर्दानगी का इतना ही शौक है,
तो पहले सच का साथ निभाना सीख,
पत्नी को डराकर रखने से पहले
उसे इंसान समझना सीख।
— रजनी
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1 hour ago

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