जीवन के उस आधार को
मीठे शब्दों के उस दुलार को,
बुरी नज़र से बचा मेरे किरदार को
जो निरंतर सँवार रही थी,
वो माँ,
मुझे आज बहुत याद आ रही थी।
तकलीफों के उस अम्बार को
मेरे अनकहे हर जज़्बात को
मेरे हर एक शुरुआत को
जो मौनभाव से निहार रही थी
वो माँ,
मुझे आज बहुत याद आ रही थी।
ममत्व के उस उपहार को
देवी रूपी उस अवतार को
मुझ पर आई हर ललकार को
जो स्वयं पर झेल रही थी
वो माँ,
मुझे आज बहुत याद आ रही थी।
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