मातृभूमि के वीरों में,
हुआ जब विरोधाभास था।
शत्रु राष्ट्र से जा मिल पहुंचे,
यह मुगल राजपूत नीति के तहत फैला द्वंद था।।
जहां हुए बारम्बार आक्रमण वह,
चितौड़गढ़ दुर्ग था।
हां, जिसकी मैं बात कर रहा वह हल्दीघाटी का युद्ध था।।
7.5'' स्तंभ-सा ऊंचा,
110kg वजन उनका
10kg तलवार और ,
70kg का भाला,
कुल 318 kg का भार,
रणभूमि में उनके संग था।।
सूर्य-सा तेज मस्तक पर,
भुजाओं में अत्यंत बल था।
अकबर भी जिनसे था डरता,
वह शूरवीर प्रताप था।
हां जिसकी मैं बात कर रहा वह,
हल्दीघाटी का युद्ध था।।
आकाश भी गुंजित हो उठा,
प्रताप के प्रताप से,
हल्दीघाटी की मिट्टी लाल हुई,
मुगलों के रक्तपात से।
अश्व जिनका था चेतक,
वह चेतक न केवल अश्व था।
आधी सेना पर जिसका,
है बड़ा वर्चस्व था।।
घायल राणा की रक्षा कर,
26 फीट की छलांग लगाई।
मानो,उस दिन हवा भी राणा के चरण स्पर्श करने आई।
मुगलों को राणा की परछाई भी हाथ न आई,
मातृभूमि के रक्षक की कर रक्षा,
चेतक ने कर्त्तव्यपरायण किया।
इतिहास के पन्नों को अपने नाम किया।।
ऐसे त्याग को कोई न भुला पाएगा,
मातृभूमि की रक्षा के खातिर,
हर कोई चेतक और प्रताप बन जाएगा।
हुआ प्रताप को बहुत संताप,
उसने कभी न मुगलों की, अधीनता को स्वीकारा था।
खड़ा रहा मेवाड़ स्वतंत्र,
लिखी अपनी शौर्य की गाथा।
हां मैं जिसकी बात कर रहा वह,
हल्दीघाटी का युद्ध था।।
जब देखा ऐसा शौर्य शक्ति ने,
उसे हुआ पछतावा था।
होता था जो कायर,
आज उसमें स्वाभिमान आया था।।
मुगलों से तोड़ी सारी संधि,
आज उसमें राष्ट्रभाव जागा था।
अकबर भी जिनसे डरता था,
वह महाराणा प्रताप था,
हां जिसकी में बात कर रहा वह,
हल्दीघाटी का युद्ध था।।
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