थक गया हूँ मैं,
ज़िंदगी से नहीं,
हर पल मज़बूत दिखने की कोशिश से।
कुछ देर रुकना है,
बिना किसी मंज़िल की चिंता किए,
बस ख़ामोशी को अपने कंधे पर सिर रखने देना है।
अब किसी का सपना
अपने कंधों पर नहीं उठाना,
एक बार अपना भी सपना
बेखौफ़ होकर देखना चाहता हूँ।
बहुत दिनों से
सबको हिम्मत देता आया हूँ,
आज किसी की बाँहों में
अपनी हिम्मत उतार देना चाहता हूँ।
कोई पूछे मुझसे भी—
"कैसा है तू?"
और पहली बार
"सब बढ़िया है"
का झूठ न बोलना पड़े।
मन करता है,
फिर से बच्चा बन जाऊँ,
बिना डर,
बिना हिसाब,
बिना कल की फ़िक्र के
गहरी नींद सो जाऊँ।
न पैसा,
न करियर,
न भविष्य...
बस कुछ पल
अपनी साँसों के साथ जी लूँ।
हर वक़्त सहारा बनते-बनते
थक गए हैं ये कंधे,
अब एक बार
मैं भी किसी का सहारा नहीं,
किसी का अपना बनना चाहता हूँ।
कोई मुझे भी
एकटक देखे,
जैसे मेरी ख़ामोशी भी
उसके लिए मायने रखती हो।
हर रिश्ते की रखवाली
मुझे ही क्यों करनी पड़े?
कभी कोई
मेरे बिखरने का भी पहरा दे।
मैं पत्थर नहीं, मैं भी एक इंसान हूँ...
मुझे भी रो लेने दो, मुझे भी टूट जाने दो,
और फिर
किसी अपने की मुस्कान से
धीरे-धीरे दोबारा जी लेने दो।
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