आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

कुछ देर मुझे भी इंसान रहने दो

                
                                                         
                            थक गया हूँ मैं,
                                                                 
                            
ज़िंदगी से नहीं,
हर पल मज़बूत दिखने की कोशिश से।

कुछ देर रुकना है,
बिना किसी मंज़िल की चिंता किए,
बस ख़ामोशी को अपने कंधे पर सिर रखने देना है।

अब किसी का सपना
अपने कंधों पर नहीं उठाना,
एक बार अपना भी सपना
बेखौफ़ होकर देखना चाहता हूँ।

बहुत दिनों से
सबको हिम्मत देता आया हूँ,
आज किसी की बाँहों में
अपनी हिम्मत उतार देना चाहता हूँ।

कोई पूछे मुझसे भी—
"कैसा है तू?"
और पहली बार
"सब बढ़िया है"
का झूठ न बोलना पड़े।

मन करता है,
फिर से बच्चा बन जाऊँ,
बिना डर,
बिना हिसाब,
बिना कल की फ़िक्र के
गहरी नींद सो जाऊँ।

न पैसा,
न करियर,
न भविष्य...
बस कुछ पल
अपनी साँसों के साथ जी लूँ।

हर वक़्त सहारा बनते-बनते
थक गए हैं ये कंधे,
अब एक बार
मैं भी किसी का सहारा नहीं,
किसी का अपना बनना चाहता हूँ।

कोई मुझे भी
एकटक देखे,
जैसे मेरी ख़ामोशी भी
उसके लिए मायने रखती हो।

हर रिश्ते की रखवाली
मुझे ही क्यों करनी पड़े?
कभी कोई
मेरे बिखरने का भी पहरा दे।

मैं पत्थर नहीं, मैं भी एक इंसान हूँ...
मुझे भी रो लेने दो, मुझे भी टूट जाने दो,
और फिर
किसी अपने की मुस्कान से
धीरे-धीरे दोबारा जी लेने दो।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 सप्ताह पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर