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ज़ेहन का घाव समझो भर ही गया

                
                                                         
                            सोच सोच की
                                                                 
                            
थकान खाली

कितने बना दिए
मकान ख़याली :(

दस
दिन बस,
करना है वो काम

उसके
बाद सिर्फ
आराम ही आराम...

उसके बाद
हर एक पल
एक नया इनाम...
एक नया सलाम...

रुख़्सत होंगे
बादल सारे...

होगा सर पे, खुला आसमान!

क्या ऐसे में,
कोई दोस्त ढूंढने जाऊं?

क्या ऐसे में,
कोई दोष बुलाके लाऊं?

कुछ मिल गया...
तो ठीक है...

चैन... तो हमेशा से ही
मेरा मीत है...

सेहत पे, काम होता रहेगा

ज़ेहन का घाव समझो भर ही गया 
-राहुल
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 घंटे पहले

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