आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

समस्या वही

                
                                                         
                            अरमानों से
                                                                 
                            
तर होके...

कराह रहा हूं...

और,
कैसे मंज़रों को...

पाना चाह रहा हूं 

चाहत, सिर्फ़,
क़ुर्बत मात्र की...

नसीब में नहीं था...
सादगी का इत्र ज़रा भी

(जो लगे पुष्प...
उनमें नहीं थी सुगंध बिलकुल भी)

बे-यक़ीनी
का ऐसा आलम है...

तिश्नगी के,
बनके रह गए गुलाम हैं :(

किसलिए सच हो रहे... सभी नाम हैं... ?!

काश,
आंखों को नसीब होते...

मंज़र, मुकाम के...

बुलंद हौसले...
डोर,
थाम भी जाते...

अभी तो
हारे हारे से :(

कैसे चंपई
अंधियारे से

धुनों के लिप्त
एक नाते से...

क्या कुछ
पा पाना है...

कुछ भी चाहने से?

-राहुल





.
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर