अरमानों से
तर होके...
कराह रहा हूं...
और,
कैसे मंज़रों को...
पाना चाह रहा हूं
चाहत, सिर्फ़,
क़ुर्बत मात्र की...
नसीब में नहीं था...
सादगी का इत्र ज़रा भी
(जो लगे पुष्प...
उनमें नहीं थी सुगंध बिलकुल भी)
बे-यक़ीनी
का ऐसा आलम है...
तिश्नगी के,
बनके रह गए गुलाम हैं :(
किसलिए सच हो रहे... सभी नाम हैं... ?!
काश,
आंखों को नसीब होते...
मंज़र, मुकाम के...
बुलंद हौसले...
डोर,
थाम भी जाते...
अभी तो
हारे हारे से :(
कैसे चंपई
अंधियारे से
धुनों के लिप्त
एक नाते से...
क्या कुछ
पा पाना है...
कुछ भी चाहने से?
-राहुल
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