लिखाई का शौक
अश्नाई की नोक
तिश्नगी का दाग
ज़िंदगी से दूर
क्या क्या कहूं मैं?
क्या ना सोचूं मैं?
एक अवसर की
मांग कर रहा हूं 🥹
मेरे पास 'कुछ' है...
पर, मैं मायूसी की भांग पी चुका हूं
गम में मुझे,
सोचने-समझने का ना बोलो!
या, ये संभावना का झुनझुना... लाओ तोड़ दूं!
अरे, प्यास कहां...
लुप्त हुई?
ऐसी कैसी
कोफ़्त हुई?
रिझाने का
है हुनर पा लिया...
मुहाने पर
है सफ़ीना आ गया...
थोड़ी तो लिखाई बेंच लूं मैं?
कितनों को ऐसे आंच दूं मैं?
चांद को मानूं... कांच का मैं!
कचड़े की गंध... का करूं, शुक्रिया मैं 🙏
(चकोर, बचाव... कर लिए जिनसे बढ़िया से)
वो गुरूर.. ना हुआ चूर!
क्या इंसाफ... का उसूल?
बैठ, अतीत की.... तख्ती ताके...
क्यों इस जनम में... बने दीवाने...
-राहुल
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