कुछ
समझ ना आना
और,
उलझते जाना
काश, महबूब
सच में ख़ुदा होते...
तो, उन्हें पा के भी...
खुशी खुशी जुदा होते
पर, कहां पाना...
लिखा था...
प्यास के दलदल में
गिरना था 🙃
जितना निकलें... उतना धसते चले जाएं...
क्या आपसे मदद का बोलें...
क्या बातों,
मज़ाकों के... गिले, शिकवे मनाएं...
कोई सफ़र तो पूरा...
करवा दो मालिक!
रोके, नज़र आईना...
मज़े के उनके राहगीर
हम,
खोते गए... मंज़िल...
सबको बतायी...
तो आपने ही थी... सिम्त?
तो मेरी नज़र में, क्यों नहीं डाले...
एक भी बिंब
एक भी दिल
समय
कम है...
आपको
खबर है
मैं, अब, जंग छोड़कर... ना भागूं
एक बार, आर या पार... लड़ ही लूं!
बेज़ार मन है...
फिर भी मैं खड़ा हूं
बेहिसाब वेग है
लम्हें ना गंवा जाऊं
-राहुल
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