दिमाग़ में उगे काँटे
वही वही मंडराए बातें
नहीं बुरा मानूंगा! चाहे, जो कर लो...
तुम वही शिकायतों की लिस्ट... दुबारा पढ़ दो
'एक काम' तो ईमानदारी से कर रहा हूं?!
अपनी बेहाली, बिना गोल किए, लिख रहा हूं :(
अपनी तरह का हठधर्मी हो चुका हूं
मेरा नसीब खराब करने वालों... देख लो, जो भी हों
ये माहौल... मैं हर हाल में बदलूंगा!
मुझे ता-'उम्र... ये शोर-शराबा नहीं गंवारा!
थोड़े अच्छे लोग... पकड़के रखेंगे
उनकी खराबी का नहीं ज़िक्र करेंगे
एक हाथ से लेना... एक हाथ से देना कह लो...
मैं अभी भी जान लुटाने वाला दोस्त ढूंढ रहा हूं...
-राहुल
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