निज स्वप्नों को पंख लगाकर,
नई उड़ानें भरती थी।
कठिन डगर की बाधाओं से,
वह किंचित नहीं डरती थी।
पुरुषों के कंधों से कंधा,
मिलाकर आगे बढ़ती थी।
पर उन स्वपनों के पंखों को,
है कुछ वहशी ने काट दिया।
मंजिल तक जाने वाले पथ को,
हाय! कांटों से पाट दिया।
ममता की मृण-मूर्ति को,
टुकड़ों टुकड़ों में बांट दिया।
नित दिवस घटित इन घटना पर,
रहे मौन भला कब तक समाज?
जिन मूल्यों और आदर्शों का,
रह गया न किंचित भी लिहाज!
फिर कोलकाता हो, कठुआ हो,
दिल्ली, उन्नाव या झांसी हो...
दामन पर दाग लगने वाले,
हर कुत्ते को फांसी हो! ।।
Rahul Jha RJ
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