हिन्दी है बीज वतन का
हिन्दी से ही है हिन्दुस्तान।
हिन्दी को भी लंगड़ाना पड़े
तो कैसा ये हिंदुस्तानी होने का अभिमान ?
जिसने हमको पाला-पोषा
होठों को भाषा सिखलाई है।
जिसने निखिल विश्व का पोषण किया
आज उसी की अस्मिता पर बन आयी है!
संस्कृत जिसकी जननी हो
वह पावनता का पर्याय है!
सनातनता का आधार वही वो
सरलता का असीम अध्याय है!
उत्तर-दक्षिण-पूरब-पश्चिम सब जिसका गुणगान करें
हर भारतवासी की वह हिन्दी पहचान बने!
आशा है, हर प्रभात को उजाला देती,
हमारी हिन्दी नव भारत के नव-संकल्पों का आधार बने!
आओ मिलकर सब जिम्मा उठाएं
हिन्दी को इक वैश्विक पहचान दिलाएं!
विविध भाषाओं का स्रोत-बिंदु वह
उसे "भाषाओं की भाषा" का सवोत्तम स्थान दिलाएं!
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