विचारों का है, यह द्वंद्व-युद्ध,
मृत्युलोक के इस कुरुक्षेत्र में।
अपना ही खंजर, खुद घायल,
खड़ा हूँ रक्तरंजित रणक्षेत्र में।
बेलगाम घोड़े कामनाओं के,
चंचल इन्द्रिय का है यह रथ।
सारथी बना अबोध मन ये,
बिना विवेक जाए किस पथ।
कर्म-गति में लोभ का कीचड़,
हम हैं दास, अहंकार राजा।
आत्मबोध की पावन झील पर,
मोह-माया का छाया कुहासा।
सोया क्यों है तू आत्मज्ञान,
उठ-जाग मन-रूपी अर्जुन।
गुरु-ज्ञान वाणी सारथी कर,
कृष्ण चरणों में सौंप आत्मरथ।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X