स्वप्न में ही आ जाते, पर तुम आ जाते;
ये व्याकुल नैन मेरे, तृप्ति पा जाते।
उर के स्पंदन में ही आ जाते, पर तुम आ जाते;
ये मौन साधे होठ मेरे, स्मित पा जाते।
श्वासों के आने-जाने में ही आ जाते, पर तुम आ जाते;
ये शोकाकुल प्राण मेरे, हर्ष पा जाते।
मेघों के वर्षण में ही आ जाते, पर तुम आ जाते;
ये निरंतर बहते अश्रु मेरे, विश्रांति पा जाते।
मयूर की केंका में आ जाते, कोकिल के कलरव में आ जाते,
पर तुम आ जाते;
ये बंद हुए कर्ण मेरे, स्वर पा जाते।
वायु के स्पर्श में ही आ जाते, पर तुम आ जाते;
ये शिथिल हुए अंग मेरे, गति पा जाते।
चंद्र किरणों में आ जाते, सूर्य के तेज में आ जाते,
पर तुम आ जाते;
ये नीरस दिन-रात मेरे, रस पा जाते।
सत्य में आ जाते, किसी आभास में आ जाते,
पर तुम आ जाते;
ये अपूर्ण स्वप्न मेरे, पूर्णता पा जाते।
बस एक बार आ जाते, क्षण भर को ही आ जाते,
पर तुम आ जाते;
यह अधरों तक अटके प्राण मेरे, मुक्ति पा जाते।
-राधा चौहान
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