आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

प्यारे बच्चों

                
                                                         
                            कुछ तैराकी ,कुछ किनारे बदलो
                                                                 
                            
बदलो, वो पुराने चश्मे सारे बदलो
तुम अपने दायरे अपनी उड़ान
खुद तय करना ।
जरूरी नहीं है ,
हर बार पुरानी पीढ़ी से उधार लेकर सीखना
कुछ खेल बदलो कुछ नियम सारे बदलो
कुछ नसीहतों को जीवन का आधार नहीं बनाओ,
कुछ नफासत और कुछ नजाकत बदलो
उठा के फेंको , दो पटखनी समस्याओं को,
और कुछ पैंतरे और कुछ अंदाज बदलो
देखना है जो कुछ नया तो
नजर बदलो नजारें बदलो
चश्मा , दूसरों वाला हजारों बदलो
जरूरी नहीं ,हर बार हुनर हूबहू सीखो
कभी उड़ान तो कभी आसमान बदलो ।
बस मत बदलना जिंदगी में खुश रहने वाली नसीहते
सीख के नहीं भूल जाना जिंदगी से जीतने का हुनर।
फिर चाहे उधार ही ले लेना ,खिलखिलाहट अपने बुजुर्गों से
पर नहीं भूलना जिंदगी में ,
पाई हुई प्यार वाली वसीयते ,अपने पुरखों की
ऊंचाइयों का दायरा भले खुद तय करना
पर नहीं भूलना उडान के सुरक्षा को
नहीं भूलना कुछ नसीहते धैर्य की
नहीं भुलना के दो जोड़ी आँखे इंतजार में होगी
हर बार तुम्हारे घर वापस आने के
नहीं भुलना वो संस्कार और सरोकार
घर लौट के आने की
जिंदगी जब भी इम्तहान ले
तो मजे से प्रस्तुत होना एक कला है
हुनर ये भी है के अपनी
खिलखिलाहट बरकरार रखी जाए।
नफ़रत नहीं करना उन रिवाज़ों ,उन सलीको से
जिसने कुछ तो सिखाया ही है तुम्हे।
समझना जिंदगी को जीने का सलीका
अपने अंदाज में
पर सोये हुए नहीं
पूरी तरह जागे हुए ।
मन से जड़ होकर नहीं चेतना हो कर।

 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
8 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर