मैं आदमी दुरुस्त हूं, मै आदमी हूं चंगा
मन मेरा साफ है, जैसे बहती गंगा
पाक है साफ है मेरी बीवी का दामन
रखती है संभालकर मेरा घर मेरा आंगन
खूब मन लगाकर पढ़ते है मेरे चारों बच्चे
ये सोचकर मन खुश होता है ,
चलो औरों से तो हैं अच्छे
मुझसे मेरा पड़ोसी कहते हैं मेरा अच्छा व्यवहार
खूब देते है हमको प्यार, खूब लेते है हम से प्यार
बाहर इज्जत खूब कमाया ,हूं अच्छा इंसान
पर घर में रहता हूं अपनी बीवी से परेशान
आलम ये है बीवी तो सबके है पास
पर हर एक को है एक और बीवी की तलाश
अपनी बीवी चाहे जितनी अच्छी हो, मन को ना भावे
जान ही निकल जाए, जब बगल वाली हँस के बतियावे
सब के मन में फूटे ये प्यार का लड्डू
वो चाहे मंगल मंगरू हो पर बदनाम है
ज्यादा अपना गुड्डू
इस मर्ज़ की कही मिले ना दवाई
पूरा जमाना ग्रस्त है, इस रोग से मेरे भाई
इस बात से डरता हूं , इसीलिए बीवी पर करता हूं हुकूमत
मेरे होते कर ले ना किसी और से मोहब्बत
मेरे जैसा हर शौहर का है हाल
बीवी के आगे नहीं गलती है किसी की दाल
बड़ी मजबूर होकर हमने लिखी है यह कविता
अगर सुनो तो माफ कर देना मुझको मेरी बबीता
-रविन्द्र अमन
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