मेरे ईश्वर, तूने कलम दी,
इसे अपनी भक्ति बता दूँ मैं।
जो टूटा है, जो रूठा है,
उसे हिम्मत जरा दिला दूँ मैं।
एक नई दिशा, नई सोच,
हर दिल में जगा दूँ मैं।
प्रभु तेरे नाम से शुरू कर,
एक नया समाज बना दूँ मैं।
दहेज की आग बुझा दूँ मैं,
बेटियों को पंख लगा दूँ मैं।
कानून की ढीली रिवायत को,
अपने लफ़्ज़ों से हिला दूँ मैं।
क्षमा, दया, ईमानदारी,
हर घर तक पहुँचा दूँ मैं।
साहित्य सेवक बन कर,
अपना फर्ज़ निभा दूँ मैं।
मेरे ईश्वर, बस इतना कर दो,
कलम मेरी कभी झुके नहीं।
जब तक साँस है सीने में,
नव प्रभात का सूरज रुके नहीं।
-पुष्पा साहू मीरा
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