शायद ऋतुओं के भी सलाहकार हो गए हैं भ्रमित
तभी तो वक्त बेवक्त गर्मी में सर्दी ,सर्दी में बारिश
समय से पहले ही पक जा रही हैं कई कई फसलें
और भ्रम में बौखलाया किसान , वादे जाते टूट।
मौसम भी हो गए हैं बेफिक्र , चाहे जो जो चाहे कहे
क्या फरक पड़ता है ,जब नहीं पड़ता है प्रकृति को
प्रकृति से ही तो और उसी के लिए ही तो थी फसल
फासला और फलक भी सब कुछ उसी के बनाए
क्या ही करेगा कोई विमर्श , विचार या पश्चाताप।
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