प्यार का कबूलनामा गुलाब से ही क्यूँ, महकती सी गुलाबी खूशबू के दीवाने क्यूँ,
यार मेरे कभी देख उस पिताम्बर ओढ़ी हुई सूरजमुखी को,
जैसे थाम रही हो ढलती शाम को, हाय इतना इतरा रही हैं,
देख मुझे कह रही हैं न महकाऊ बघिया को फिर भी सूरज मुझे देख आहे भरता है,
सावन भी बरसता है मेरे आलिंगन को,
इक तु कन्याकुमारी पीली पहने समझे खुद को सूरजमुखी, फिर इक मैं ही सूरजमुखी सूरजमुखी।
-प्रियंका सामरिया
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