आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

सावन भी बरसता है मेरे आलिंगन को

                
                                                         
                            प्यार का कबूलनामा गुलाब से ही क्यूँ, महकती सी गुलाबी खूशबू के दीवाने क्यूँ,
                                                                 
                            
यार मेरे कभी देख उस पिताम्बर ओढ़ी हुई सूरजमुखी को,
जैसे थाम रही हो ढलती शाम को, हाय इतना इतरा रही हैं,
देख मुझे कह रही हैं न महकाऊ बघिया को फिर भी सूरज मुझे देख आहे भरता है,
सावन भी बरसता है मेरे आलिंगन को,
इक तु कन्याकुमारी पीली पहने समझे खुद को सूरजमुखी, फिर इक मैं ही सूरजमुखी सूरजमुखी।
-प्रियंका सामरिया
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
43 minutes ago

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर