हमारा रिश्ता ही ऐसा है सास बहु का,
दुनिया ने अपनी नज़रो से देखा, वंही समझा जैसी रीत जगत ने समझाया,
मै जो कुछ भी करती वो फर्ज़ था,और अच्छा करती वो दिखावा लगता था,बनावटी लगता था सबको,
चाहते हुए भी हमारे मत एक नहीं हुए फिर भी एक उम्मीद हमेशा बनी रही,आपकी सीख याद रहेगी!
आज एहसास होता है कि माँ बिना मायका नहीं होता और सास बिना ससुराल नहीं होता,
सास होती है तो किसी की हिम्मत नहीं होती दूसरी सास बनने की,
कुछ लोगो ने आज मुझे कटघरे मे खड़ा कर दिया शायद उनको पता नहीं कि "कर्मा " कितने बलवान होते है,
आप कहते हो कि मुझे गुस्सा ज्यादा आता है फिर भी मेरा अपने कर्मो और विचारों पर पूरा संयम रहता है,
हमारा आपसी संवाद हमेशा सौहार्दपूर्ण रहा, मैंने कभी आपसे स्वेच्छा से ऊँची आवाज़ मे बात नहीं की!
कुछ कुदरत ने रिश्ता ही ऐसा बना दिया कि बहु की सास को लेकर जताई गयी परवाह दिखावा लगी और अपने बच्चों की परवाह मे प्यार झलकता है,
एक दूसरे को समझने मे लम्बा वक़्त लग गया,
काफ़ी कुछ छुट सा गया शायद इसलिये कि इन रिश्तो मे दायरे होते हैं,
तभी तो माँ से मिलने क़े लिए अनुमति नहीं लेनी पड़ती और सास से मिलने के लिए माहौल और लोग देखने पड़े,
मैं ये साबित कभी नहीं कर सकती कि मुझे आपकी फ़िक्र है या नहीं!
आप मेरा हाथ पकड़ कर मुझे अपने साथ अपने घर लेकर आयी थी,अब आप साथ भी निभाइये!
जैसा भी हमारा खट्टा मीठा रिश्ता रहा हो लेकिन मैंने कभी आपक़े बारे मे बुरा नहीं सोचा, हमेशा आपके संघर्ष की सराहना की!
मैंने भला बुरा जो भी किया हो खुद क़े साथ ही किया, बाकि लोगो को मेरी तरफ से क्रिया क़े तौर पर प्रतिक्रिया मिली,
आपने अपने बेटे मे राम की छवि देखी, आपके दोनों पोतो को लव-कुश नाम दिया लेकिन मै कभी सीता नहीं बन पायी और मुझे उसका पछतावा भी नहीं है!
जो अभी वकील बने बैठे है एक दिन मुकदमा उन पर भी वक़्त चलाएगा, तब न तो तुम्हारे पास देने क़े लिए दलीले होंगी,ना करवाने क़े लिए अपीले, ज़मानत की उम्मीद मे तारीखे मिलेगी!
आप जल्दी से स्वस्थ हो जाइये...
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