जन्म हुआ मां की कोख से ,दुनिया में आँखे खोली
पहली बार होठ मुस्काये जब मां की सुनी बोली।।
पल बीते ,महीने बीते,बीते कई साल,
छोटी से जाने कब बड़ी हो गई आ गई मैं ससुराल।।
छूट गए पीछे सारे गलियां और चौबारे,
बचपन के वो खेल खिलौने, वो नदियाँ के किनारे।।
बाबुल का आंगन सुना हो गया, मां का छूटा आँचल,
पी की गली गुलजार हो गई, छम छम बजते पायल।।
मै जीत गई या हार गई,ये जाने न मन बेचारा,
दो घरों के बीच हो गया बिटिया का बंटवारा।।।।
-प्रिया आनंद शर्मा
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X