चेहरे पर उसके सादगी का ऐसा नूर है,
आँखों में जैसे कोई ख़ामोश सुरूर है।
उसकी मुस्कान से ठहर जाता है मेरा दिल
शायद इसी को कहते इश्क़ का फ़ितूर है।
वो हँसती है तो मौसम भी सँवर जाता है,
दिल का बेरंग कोना दफ्तन निखर जाता है।
उसकी मुस्कान में ऐसी कशिश है कि अक्सर,
देखने वाला ख़ुद ही खुद में बिखर जाता है।
मैं तारीफ़ करूँ तो अल्फ़ाज़ कम पड़ते हैं,
उसके सामने सारे फ़साने कम पड़ते हैं।
वो पूछे अगर “मुझमें ऐसा क्या है?”
तो कह दूँगा “तुम्हें देखकर सवाल कम पड़ते हैं।”
उससे ना सुन कर भी हमें जीना मंजूर है
कुछ भी कहो यारों वो आसमान की हूर है
उसका दिल दुखाया है किसी ने सोच समझ कर
हमें उसके दिल से निकालना ही ये नासूर है।
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