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सादगी का नूर

                
                                                         
                            चेहरे पर उसके सादगी का ऐसा नूर है,
                                                                 
                            
‎आँखों में जैसे कोई ख़ामोश सुरूर है।
‎उसकी मुस्कान से ठहर जाता है मेरा दिल
‎शायद इसी को कहते इश्क़ का फ़ितूर है।

‎वो हँसती है तो मौसम भी सँवर जाता है,
‎दिल का बेरंग कोना दफ्तन निखर जाता है।
‎उसकी मुस्कान में ऐसी कशिश है कि अक्सर,
‎देखने वाला ख़ुद ही खुद में बिखर जाता है।

‎मैं तारीफ़ करूँ तो अल्फ़ाज़ कम पड़ते हैं,
‎उसके सामने सारे फ़साने कम पड़ते हैं।
‎वो पूछे अगर “मुझमें ऐसा क्या है?”
‎तो कह दूँगा “तुम्हें देखकर सवाल कम पड़ते हैं।”

‎उससे ना सुन कर भी हमें जीना मंजूर है
‎कुछ भी कहो यारों वो आसमान की हूर है
‎उसका दिल दुखाया है किसी ने सोच समझ कर
‎हमें उसके दिल से निकालना ही ये नासूर है।

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17 घंटे पहले

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