बात बहुत पुरानी,बचपन की,60 वर्ष की
अख़बार का इन्तज़ार,एक छोटे क़स्बे में
आदत ही नहीं,एक जुनून, पढ़ना अख़बार
नही टीवी,नही मोबाइल, साधन अकेला
देश दुनिया की तमाम,ख़बरों का आईना।
शाम चार बजे,दिन के अख़बार का दर्शन
अखबार वाला साइकिल पर, झपटा पेपर
पढ़ता , एक एकं पन्ना, ध्यान से समाचार
हर सम्पादकीय,कार्टून,खेल न्यूज़,विज्ञापन
नहीं भरता मन,दोबारा पढ़ते,कुछ छूटे नहीं।
स्टेट्समैन हो,या द टेलीग्राफ या कोई और
एडिटर का पेज,समीक्षा,था ज्ञान का स्रोत
कुलदीप नय्यर, ख़ुशवंत सिंह के लेख
घटना की समीक्षा,राजनीतिक विश्लेषण
विचार ,विश्लेषण की क्षमता का सृजन।
स्कूल की उम्र,अख़बार, किताबों का शौक
अंग्रेज़ी भाषा जानना,हिन्दीभाषी स्कूली को
बना अभिन्न अंग,भविष्य के जीवनशैली का
समझने में , सामाजिक उतराव चढ़ाव का
जीवन के सफर को मदद, सक्षम बनाने में।
आज के अख़बार,नकारात्मक खबर लिये
मन नहीं करता , ज्यादा समय बिताने को
रेप, हत्या, टेरर अटैक,राजनीतिक झगड़े
समाज को विभाजित करने की साज़िशें
मन ऊब जाये,अख़बार के पन्ने पलटने में।
-प्रेम वर्मा
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