छह साल का वो इश्क आज एक तमाशा बन चुका है,
जो कल तक मेरी दुनिया थी, आज वो किसी और की जान बन बैठी है।
जिसके इश्क़ में खुद को भुला बैठा हूँ मैं,
वो गैरों की महफ़िल में मुझे नादान कहती है।
हकीकत् ब्यां न हो जाए खाती है पापा की कसमें,
जाने कितनो को यकिन दिलाने मे खाई होगी यही कसमे।
आज सबको अपनी महफ़िल का मेहमान बताती है,
जब भी शक होता है मुझे, तो वो रोकर मनाती है।
लगाकर इल्ज़ाम मुझपे, खुद का पाक-दामन बताती है,
जिस हुस्न को पूज रहा हूँ आज उसे गैरों को सरेआम कहती है।
कहती है कि इस गली में सिर्फ मेरे खातिर आती है,
पर इस गली के हर आशिक़ को, वो अपना अहतराम कहती है।
वो कैसे किसी गैर को बालों में उंगलियां फेराने देती है?
जिस पे सिर्फ मेरा हक़ है, उसे महज़ इक अहसान कहती है।
वो होठों की लाली बिखरना, वो बाहों का घेरा बनाना,
जो मेरा मज़हब है, उसे अब वो अंधा ईमान कहती है।
लोग सच ही कहते हैं कि वफ़ा हर खून में नहीं होती,
गलत मिट्टी की इस उपज से, नस्ल अच्छी नहीं उगती।
जब ज़मीन ही बंजर है तो वफ़ा के फूल कहाँ खिलेंगे,
छह साल के वादे तोड़कर, वो बस नस्ल का नुक्सान कहती है।
वहम है मेरा कि मैं 'जान' हूँ उसकी, या मेरी सादग़ी का मिली सज़ा है,
कि वो मेरे दिल से खेलकर, अपनी जवानी की नादानी कहती है।
पर इस नए दौर की हसीनों का कोई भरोसा नहीं ए दोस्त,
जो हर रोज़ मकान बदले है, दुनिया उसे रूह से बेघर इंसान कहती है।
—: प्रेम शंकर
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X