🧸 बचपन और खिलौने 🧸
बचपन में जिसके साथ खेला, आज वही सवाल बनकर खड़े हैं,
जिसको हम बेजान समझते थे, आज वही मुझसे हिसाब मांग रहे हैं।
जब भी तुम स्कूल से आते, मेरे साथ बैठकर खाना ही खाते,
जब पड़ी मम्मी की तुम पर डाँट, मुझे पकड़ के रोते सो जाते।
अब तो मुझको छोड़ दिये हो, नयी साथी से खुशियाँ जोड़ लिये हो,
अब तो सब कुछ मिल जाता होगा, खिलौनों से कहाँ बातें करता होगा।
सपनों को साकार करने के खातिर, बिन खाए दफ्तर जाता भी होगा,
तुम्हें कमा के लाना होगा, बिन खुशियों के मुस्कुराना भी होगा।
अब तो टेंशन में सोता होगा, बचपन की यादों में रोता होगा,
खिलौनों की जगह अब कोई तुम्हारे जज़्बात से खेलता होगा।
बड़ी उम्र का यह बड़ा ज़माना, मुझे छोड़ कर क्या-क्या पाया होगा।
— प्रेम शंकर
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