मुसीबत में काम कोई आता नहीं है जान के महरूमी किसी की बुझा के अरमां सारे दिल में चिराग़ कोई जलाता नहीं
तुम मत समझना इसे मजबूरी मेरी बना के बहाने हज़ार सुना के फसाना ए मजबूरी सामने धड़कनें भी तू बढ़ाता नहीं
बढ़ा कर फासला दिल मेरा तोड़ने वाले इरादा तेरा भी समझ ना पाया कभी करके इंतजार तू मुझको आजमाता नहीं
जानता हूं उम्मीदों पर जीने से होगा नहीं फायदा हमें दर्द सिर्फ ये खातिर या लिहाज से अपना हमें तू भी मानता नहीं
लाकर करार बेचैन दिल में अंजाम ए वफा पड़ा हमें खोकर चैन ओ सकूं कहूं दर्द कैसे तू सच हमें अपना बताता नहीं
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