या खुदा तुमसे आज़ गिला बहुत ये सिर्फ सोच के बेईमानों की कद्र अब तो तेरे दरबार में बहुत है
देकर कर गम हजार हमें मिला क्या तुम्हें ईमान की कद्र ना रही कभी ये आइना ए सच ही बहुत है
करना इनायत गरीबों पर तुमने जाना कहां सच हुआ है शर्मिंदा और ये खामोशी आपकी बहुत है
हुआ सच ओ ईमान बदनाम बार बार खाया धोखा कितनी बार बेईमानों से ये सच भी तो बहुत है
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