किस्मत से लड़ रहे हैं समझ कर तुम्हें अपना बढ़ा के बेचैनियाँ दिल में होकर मायूस जिंदगी से दर्द अपना कह रहे हैं
जाओ चिराग़ कहीं और हमसे ना होगा सिफारिश तेरा खाकर ठोकरें बार बार राह ए तलब अब दर्द तुमसे कह रहे हैं
ठुकरा हमें राह ए तलब समझ ना पाया तू कभी सीख के हुनर जीने का जला के चिराग़ ए दिल सच तुमसे कह रहें हैं
फिर भी खातिर या लिहाज़ से अंदाज़ तेरा सोचना पड़ा है हमें सुना जो गैरों के मुंह से वो सच नहीं तुमसे कह रहे हैं
बदल कर मिजाज़ गर खुश हो तो ये मर्जी तेरी सिखाया है हमें अंधेरों में जीने का होकर मायूस सच तुमसे कह रहे हैं
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