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फसाना ए तड़पती यादें

                
                                                         
                            अपनी ही नाकामियों का जश्न मैं मना रहा हूं चल कर अजनबी शहर के अजनबी रस्तों में दर्द मैं बढ़ा रहा हूं
                                                                 
                            
गिला तुमसे करना आसान इतना नहीं बढ़ा कर अब मैं मुश्किलें सारी लौट के तेरे दर से फासला बढ़ा रहा हूं
सामने तेरे जिक्र मुफलिसी का भी अब मैं कर सकता नहीं कर के इंतजार तेरे वादों का दूरियां बढ़ा रहा हूं
बगैर तेरे मेरी जिंदगी को हुआ क्या सोच कर कुछ देर डूब कर ख्वाबों से अब मैं दिल अपना बहला रहा हूं
उदासियां भी कर रही इशारा मुझको हुआ क्या मैं होकर अब मजबूर तेरी दुनिया से फासला बढ़ा रहा हूं
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एक घंटा पहले

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