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फसाना ए रस्म ए उल्फत

                
                                                         
                            क्या सोच कर मै आपसे वादा ए रस्म निभा रहा हूं मैं अपनी ही बेकरारी पर ज़ुल्म चाह रहा हूं
                                                                 
                            
बदन मेरा राख हो चुका दिल को बचा रहा हूं तेरे आने की खबर से घर अपना अब सजा रहा हूं
मेरे हर सांस में तेरा ही हुक्म शामिल है तुमने जब भी जो चाहा ईमान से वही करता आ रहा हूं
गंवा कर खुद को अब ज़िन्दगी से लड़ रहा हूं तेरे लिए मरना है तेरे लिए जीना है ये सीख रहा हूं
ख्वाबों में तेरा आना जाना जमाने से देख रहा हूं और बर्बादी से ही अब तो मैं याराना निभा रहा हूं

 
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8 घंटे पहले

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