मैं कुछ दिनों से होकर तेरी दुनिया से दूर अपने ही घर रह के मजबूर अब रफ्ता रफ्ता सुधर रहा हूं
हकीकत को समझ कर हकीकत तेरी खबर मैं क्या लेता मैं करूं क्या मैं खुद से ही बेखबर रहा हूं
कैसे कहूं नसीब न हुआ मेरा आग बरस रही गम ए हयात में बन कर राख अब मैं ही बिखर रहा हूं
कभी सोचो अचानक कैसे बदल जाऊंगा हकीकत ये है तेरी गली से गुनगुना कर मैं ही गुज़र रहा हूं
ये न सोचा देख कर हमें तू बदल जाएगा कुछ सोच समझ के मैं आज तेरी गली से ही गुज़र रहा हूं
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