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फसाना ए महरूम जिंदगी

                
                                                         
                            ताकत कलम की कमजोर हो गई है इंसानियत कितनी मजबूर हो गई जान कर सच फिक्र हमें करना पड़ा
                                                                 
                            
ये वो दुनिया है जहां जाहिल गंवार खुद को समझने लगे खुदा आकर इस दुनियां में सच ये समझना पड़ा
जो दिल का सच्चा किस्मत से ही वो गरीब है ये समझ ना पाए हम कभी तभी तो मिटा के अरमां रोना पड़ा
या खुदा तुम कर ना पाए हो अहसास किसी महरूम का राह ए वफा खाकर ठोकरें बार बार दर्द ढोना पड़ा
गुज़ारा हम महरुमो का होता कैसे ये तुम क्या जानो बढ़ा कर दर्द बार बार चिराग़ ए दिल हमें बुझाना पड़ा

 
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2 घंटे पहले

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