आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

फसाना ए दिल ए नाकाम

                
                                                         
                            है ये कितना अजीब तमाशा सितमगरों का इरादा ए जफा नहीं जाता उन्हें कत्ल करना किसका ये कहा नहीं जाता
                                                                 
                            
ये कम है जो बैठा मेरे करीब वो बैठा ही रहेगा पास जब तक मिटा कर ख्वाब सारे मेरे दिल को सता नही जाता
है शहर अंजान हमें फर्क नही तुम्हे शहर का रस्म ओ रिवाज नहीं पता शायद तुम्हें भी अर्ज ए अदा नहीं आता
मैं तमाशा जो देख रहा हूं हैं जो मेरे बहुत अजीज सितम क्यूं मुझ पर खुदा कसम मुझे हादसा देखा नहीं जाता
मिटा कर अरमां खाक भी हुए हम पी कर जहर का घूंट पाया मुकाम बर्बादी का जहां हर कोई देखा नहीं जाता
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
7 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर